बैठ लें कुछ देर,आओ,एक पथ के पथिक-सेप्रिय, अंत और अनन्त के,तम-गहन-जीवन घेर।मौन मधु हो जाएभाषा मूकता की आड़ में,मन सरलता की बाढ़ में,जल-बिन्दु सा बह जाए।सरल अति स्वच्छ्न्दजीवन, प्रात के लघुपात से,उत्थान-पतनाघात सेरह जाए चुप,निर्द्वन्द ।
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हरि आप हरो जन री भीर। द्रोपदी री लाज राखी , आप बढ़ायो चीर। भगत कारण रूप नरहरि , धरयो आप सरीर। बूढ़तो गजराज राख्यो , काटी कुञ्जर पीर। दासी मी...
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